धातु रूप – (तिड्न्त प्रकरण) की परिभाषा, भेद और उदाहरण

 

धातु रूप – (तिड्न्त प्रकरण)

धातुरूपावलि (तिङन्त-प्रकरण)

संस्कृत में क्रिया-पद पर विचार करने का प्रसंग ही तिङन्त-प्रकरण है। पद के स्वरूप पर विचार करते समय सभी सार्थक शब्दों को ‘पद’ कहा जाता है। इन सभी सार्थक शब्दों को तीन ‘वर्गों’ में बाँट दिया गया है-

  1. नाम,
  2. आख्यात और
  3. अव्यय।

संस्कृत में क्रिया

‘आख्यात’ पद को ही क्रिया-पद’ कहते हैं और क्रिया-पद वे होते हैं जो किसी कर्ता के काम या कुछ करने को बताते हैं। उदाहरण के लिए एक वाक्य लें- रामः पुस्तकं पठति। (राम पुस्तक पढ़ता है।)

इस वाक्य में ‘रामः’ कर्ता है, ‘पुस्तकम्’ कर्म-पद है, कारण उसी को पढ़ा जा रहा है और ‘पठति’ क्रिया-पद या ‘आख्यात’ है, कारण यही ‘राम’-रूप कर्ता के कुछ करने (पढ़ने) को बताता है।

तिड्न्त प्रकरण (धातु रूप)

अब ‘पठति’ क्रिया-पद के रूप पर थोड़ा गौर करें। संस्कृत में किसी भी क्रिया-पद का निर्माण ‘धातु’ और ‘प्रत्यय’ के मिलने से बनता है। उदाहरण के लिए ‘पठति’ में ‘पठ्’ मूल धातु है और ‘ति’ (तिप्) प्रत्यय है। इन दोनों के मिलने से ही ‘पठति’ रूप बनता है। जैसे-

  • पठ् + शप् + तिप्
  • = पठ् + अ + ति
  • = पठति (पढ़ता है।)

 

संस्कृत के धातु

संस्कृत के धातु-पदों में लगनेवाले उपर्युक्त 18 ‘तिङ् प्रत्ययों में प्रथम 9 प्रत्यय परस्मैपद के हैं और बाद के 9 प्रत्यय आत्मनेपद के।

संस्कृत में धातु-पदों के तीन वर्ग हैं-
(क) परस्मैपदी धातु-जिन धातुओं में प्रथम 9 तिङ् प्रत्यय (तिप्, तस्, झि; सिप्, थस्, थ; मिप्, वस्, मस्) लगते हैं।
(ख) आत्मनेपदी धातु-जिन धातुओं में बादवाले 9तिङ् प्रत्यय (त, आताम्, झ; थास्, आथाम्, ध्वम्; इट्, वहि, महिङ्) लगते हैं।
(ग) उभयपदी धातु अर्थात्, जो धातु-पद परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों हैं और जिनमें अर्थ के प्रसंग के अनुसार दोनों प्रकार के प्रत्यय लगा करते हैं।

 

परस्मैपद धातुओं की रूपावलि

  1. भू (होना)
  2. पठ् (पढ़ना)
  3. गम् (जाना)
  4. स्था (ठहरना, स्थित होना, रहना)
  5. पा (पीना)
  6. दृश्/पश्य (देखना)
  7. दाण-यच्छ (देना)
  8. शुच् (शोक करना)
  9. अर्च्/पूजा (पूजा करना)
  10. तप्/तपना (तपना, तपस्या करना)
  11. हन् (मारना)
  12. अस् (होना)
  13. नृत् (नाचना)
  14. नश् (नाश होना)
  15. चि/चिञ् (-चिञ्-चुनना)
  16. इष् (चाहना, इच्छा करना)
  17. त्रस् (-डरना, उद्विग्न होना, भयभीत होना)
  18. लिख् (लिखना)
  19. प्रच्छ् (पूछना)
  20. सिच् (सींचना)
  21. मिल् (मिलना)
  22. विद् (जानना)
  23. दिश् (इंगित या संकेत करना)
  24. तुद् (कष्ट देना)
  25. मुच् (त्याग करना, छोड़ना)
  26. ग्रह (पकड़ना, ग्रहण करना)
  27. ज्ञा (जानना)
  28. गण (गिनना)
  29. पाल् (=पालना-पोसना, रक्षण करना)

तिङ् प्रत्यय उपर्युक्त प्रकार से ही सभी क्रिया-पदों के रूप बनते हैं। क्रिया-पदों के निर्माण के क्रम में मूल धातुओं के साथ जुड़नेवाले ये ‘तिप्’ आदि कुल प्रत्यय 18 हैं। इनमें प्रारंभ में ‘तिप्’ प्रत्यय है और अन्त में ‘महिङ्’ प्रत्यय है। इन 18 प्रत्ययों को एक साथ बतानेवाले सूत्र के रूप में पहले प्रत्यय ‘तिप्’ का ‘ति’ ले लिया गया है और अन्तिम (18वे) प्रत्यय ‘महिङ्’ का ‘ङ्’, और दोनों को मिलाकर ‘तिङ्’ प्रत्यय (या प्रत्यय-समूह) का बोध कराया जाता है।

ये ‘तिङ्’ प्रत्यय मूल धातुओं के साथ जुड़ते हैं, अतः इनसे बने पदों को ‘तिङन्त’ कहते हैं। प्रकरण ‘अध्याय को कहते हैं। ‘तिङन्त-प्रकरण’ इस बात पर विचार करता है अथवा ‘तिङन्त-प्रकरण’ में इस बात पर विचार किया गया है कि मूल धातुओं में इन प्रत्ययों के लगने से बने क्रिया-पदों का ‘पुरुष’, ‘वचन’ और ‘काल’ की दृष्टि से क्या रूप और अर्थ होता है।

शब्दों का निर्माण शब्द चाहे नाम-पद हो या आख्यात-पद-प्रकृति और प्रत्यय के मिलने से ही होता है। ‘प्रकृति’ मूल धातु-पद को कहते हैं। इनमें लगनेवाले ‘तिङ्’ प्रत्यय, जो संख्या में 18 हैं, निम्नांकित हैं-

ऊपर की तालिका में कुछेक प्रत्यय की बगल में कोष्ठक में दिए गए रूप उन प्रत्ययों में अन्त में लगे हलन्त वर्णों (प, ट् और ङ्) के लोप के बाद उनके बचनेवाले रूपों का संकेत करते हैं।

आत्मनेपदी धातुओं की रूपावलि

  1. ग्रह (पकड़ना, ग्रहण करना)
  2. ज्ञा (जानना)
  3. गण (गिनना)
  4. पाल् (पालना-पोसना, रक्षण करना)
  5. सेव् (सेवा करना)
  6. लभ् (पाना)
  7. वृत् (होना)
  8. शुभ् (शोभता है)
  9. शीङ् (=सोना, शयन करना)
  10. विद् (होना, रहना)
  11. मन् (मानना)

 

उभयपदी धातुओं की रूपावलि

  1. पच् (पकाना)
  2. दुह् (दूहना)
  3. ब्रू (बोलना)
  4. दा (देना)
  5. तन् (विस्तार करना)
  6. कृ (करना)
  7. क्री (खरीदना)
  8. चुर (चुराना)

 

धातुओं के ‘विकरण’

‘विकरण’ उस वर्ण या वर्ण-समूह को कहते हैं जो प्रकृति और प्रत्यय के मध्य में जुड़ता है, जिससे संपूर्ण क्रिया-रूप सामने आ सके। उदाहरण के लिए नीचे कुछ संपूर्ण क्रिया रूपों को उनकी बगल में उनके ‘विकरण’ के साथ दिखाया जाता है-

  • संपूर्ण क्रिया-रूप या क्रिया-पद – प्रकृति + विकरण + प्रत्यय
  • भवति – भू + शप् (अ) + तिप् (ति)
  • दीव्यति – दिव् + श्यन् (य) + तिप् (ति)
  • सुनोति – सु + श्नु (नु) + तिप् (ति)
  • तनोति – तन् + उ + तिप् (ति)
  • चोरयति – चुर् + णिच् + शप् (अय) + तिप् (ति)

दिए गए उदाहरणों में शप्, श्यन्, श्नु, उ, णिच् वगैरह वर्ण या वर्ण-समूह धातुओं के विकरण हैं। इनके बीच में आने पर ही मूल धातु (प्रकृति) और प्रत्यय मिलकर सार्थक क्रिया-पदों का निर्माण करते हैं।

 

धातुओं के ‘गण’

‘गण’ का अर्थ होता है ‘समूह’। ऊपर जिन ‘विकरणों’ की चर्चा की गई है वे संख्या में दस हैं। वे संस्कृत के सभी धातुओं में अवश्य लगते हैं। कुछेक जिन धातुओं में किसी ‘विकरण’ के जुड़ने का एक-जैसा ढंग है उन सबको एक ‘गण’ का या एक ‘गण’ में मान लिया गया है। ऐसे ‘गण’ कुल दस हैं, जो विकरण की संख्या के समानान्तर हैं। इन दस गणों में प्रत्येक के प्रारंभ में जिस धातु के नाम का पाठ किया जाता है उसी के नाम पर उस ‘गण’ का नामकरण कर लिया गया है। ये दस ‘गण’ हैं—

 

संस्कृत की लकारे

  1. भ्वादि (‘भू’ आदि), – लट् लकार (Present Tense)
  2. अदादि (‘अद्’ आदि), – लोट् लकार (Imperative Mood)
  3. जुहोत्यादि (‘हु’ आदि), – लङ्ग् लकार (Past Tense)
  4. दिवादि (‘दिव्’ आदि), – विधिलिङ्ग् लकार (Potential Mood)
  5. स्वादि (‘सु’ आदि), – लुट् लकार (First Future Tense or Periphrastic)
  6. तुदादि (‘तुद्’ आदि), – लृट् लकार (Second Future Tense)
  7. रुधादि (‘रुध्’ आदि), – लृङ्ग् लकार (Conditional Mood)
  8. तनादि (‘तन्’ आदि), – आशीर्लिन्ग लकार (Benedictive Mood)
  9. क्यादि (‘क्री’ आदि) एवं – लिट् लकार (Past Perfect Tense)
  10. चुरादि (‘चुर्’ आदि)। – लुङ्ग् लकार (Perfect Tense)

तात्पर्य यह कि इन्हें भ्वादिगण, अदादिगण आदि कहा जाता है।

नीचे इन धातु-गणों को उनके विकरण एवं उदाहरण के संग एक साथ दर्शाया जाता है।

धातु गण – विकरण – उदाहरण

  1. भ्वादिगण – शप् (अ) – भू + अ + ति भवति
  2. अदादिगण – शप-लुक् (०) – अद्+०+ति-अत्ति
  3. जुहोत्यादिगण – शप्-श्लु (०) – हु (जुहु)+ति-जुहोति
  4. दिवादिगण – श्यन् (य) – दिव्+य+ति-दीव्यति
  5. स्वादिगण – श्नु (नु) – सु+नु+ति-सुनोति
  6. तुदादिगण – श (अ) – तु+अ+ति-तुदति
  7. रुधादिगण – श्नम् (न) – रुध्+न+ति-रुणद्धि
  8. तनादिगण – उ – तन्+उ+ति-तनोति
  9. क्यादिगण – श्ना (ना) – क्री+ना+ति-क्रीणाति
  10. चुरादिगण – णिच्+शप् (अय) – चु+अय+ति-चोरयति

इन ‘गणों’ की भिन्नता से एक-जैसे दिखाई पड़नेवाले धातुओं के रूप भी भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। इस क्रम में कई बार अर्थ नहीं बदलते हैं, पर कई बार अर्थ बदल भी जाते हैं। जैसे-

  • भ्वादिगण – अर्च+अ+ति-अर्चति – पूजा करता है।
  • चुरादिगण – अर्च+अय+ति-अर्चयति – पूजा करता है।
  • भ्वादिगण – अर्जु+अ+ति-अर्जति – अर्जन करता है।
  • चुरादिगण – अर्जु+अय+ति-अर्जयति – अर्जन करता है।
  • तुदादिगण – कृ+अ+ति-किरति – बिखेरता है।
  • क्यादिगण – कृ+ना+ति कृणाति हिंसा करता है।
  • तुदादिगण – गृ+अ+ति=गिरति निगलता है।
  • क्रयादिमण – गृ+ना+तिगृणाति शब्द करता है।

संस्कृत क्रिया-पदों के ‘काल’ (Tense)

किसी भी क्रिया का कर्ता उससे सूचित होनेवाले कार्य को तीन ही समयों में कर सकता है। ये तीन ‘समय’ हैं-
(क) समय, जो बीत गया—भूतकाल (Past Tense)
(ख) समय, जो बीत रहा है वर्तमानकाल (Present Tense)
(ग) समय, जो आनेवाला है—भविष्यत्काल (Future Tense)

पर यह स्थूल वर्गीकरण है। इनमें प्रत्येक के कुछ और-और रूप-रंग भी हैं। जैसे-
(क) सामान्य भूतकाल-जो समय बीता ही हो।
(ख) अनद्यतन भूतकाल-जो समय आज के पहले बीता हो।
(ग) परोक्ष अनद्यतन भूतकाल-जो आज के पहले और बहुत पहले बीता हो।

फिर,

(क) सामान्य भविष्यत्काल—जो समय आजकल में आनेवाला हो।
(ख) अनद्यतन भविष्यत्काल—जो समय आज के बाद आनेवाला हो।
(ग) हेतुहेतुमद् भविष्यत्काल—एक समय में होनेवाली एक क्रिया के बाद संभावित दूसरी क्रिया का काल।।

जैसा कि ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि संस्कृत में भूतकाल एवं भविष्यत्काल के तीन-तीन भेद या रूप माने गए हैं। जहाँ तक वर्तमानकाल का संबंध है, उसका एक ही भेद या रूप माना जाता है।।

उपर्युक्त सात क्रिया-रूपों के अतिरिक्त संस्कृत में क्रिया-रूपों के तीन प्रकार और हैं-
(क) क्रिया-रूप, जिससे आदेश आदि सूचित होता है।
(ख) क्रिया-रूप, जिससे अनुज्ञा, आशीर्वाद या कल्याण-कामना सूचित होती है।
(ग) एक विशेष क्रिया-रूप, जो सामान्य (लौकिक) संस्कृत में नहीं—वैदिक संस्कृत में ही पाया जाता है।

“क्रिया’

“क्रिया’ के इन दसों रूपों को लकारों के सहारे (संस्कृत में) व्यक्त किया जाता है, जिसे ‘लकारार्थ-प्रक्रिया’ कहते हैं, अर्थात् संस्कृत में क्रिया-पदों की काल-रचना। उपर्युक्त विवेचन को ध्यान में रखते हुए उसी क्रम से ये दसों लकार नीचे दिए जाते हैं-

  1. लुङ्—सामान्य भूतकाल—अद्य सुष्ठु वृष्टिः अभूत्। (आज अच्छी वर्षा हुई।)
  2. लङ्-अनद्यतन भूतकाल—ह्यः वृष्टिः अभवत्। (कल वर्षा हुई थी।)
  3. लिट्-परोक्ष अनद्यतन भूतकाल-राम-रावणयोः युद्धं बभूव। (राम-रावण में युद्ध हुआ था।)
  4. लुट्—सामान्य भविष्यत्काल—अद्य वर्षाः भविष्यन्ति। (आज वर्षा होगी।)
  5. लुट-अनद्यतन भविष्यत्काल—श्वः वृष्टिः भविता। (कल वर्षा होगी।)
  6. लुङ्-हेतुहेतुमद् भविष्यत्काल-यदि सुवृष्टिः अभविष्यत् तर्हि सुभिक्षम् अभविष्यत्। (यदि अच्छी वर्षा होगी तो फसल भी अच्छी होगी।)
  7. लट्-वर्तमानकाल–अद्य वृष्टिः भवति। (आज वर्षा होती है।)
  8. लोट-आदेश आदि के लिए—
    (क) भवान् मम सहचरः भवतु। – (आप मेरे साथी होइए।)
    (ख) तव कल्याणं भवतु। – (तुम्हारा कल्याण हो।)
  9. लिङ्—
    (क) अनुज्ञा या विधिपरक-भवान् मम सहचरो भवेत्। – (आप मेरे सहायक हों।)
    (ख) आशीर्वाद या कल्याण-कामनापरक-तव कल्याणं भूयात्। – (आपका कल्याण हो।)
  10. लेट्—इस लकार का प्रयोग केवल वैदिक संस्कृत में ही मिलता है, लौकिक संस्कृत में नहीं; अतः उदाहरण छोड़ा जा रहा है।

सारांश यह कि सामान्यतया काल-रूप-भेद की दृष्टि से संस्कृत में उपर्युक्त प्रमुख 9भेद (अन्तिम को छोड़कर)होते हैं और वे वर्तमानकाल-1+भूतकाल-3+भविष्यत्काल-3+आदेश अनुज्ञा-आशीर्वादबोधक-2 क्रिया-रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन सभी रूपों के वाचक कुछ प्रत्यय हैं, जिनके प्रारंभ में ‘ल’ (जैसे-लुङ्, लङ्, लिट्, लुट्, लुट्, लुङ्, लट्, लोट् और लिङ्) लगे रहने के कारण इन्हें ‘लकार’ कहते हैं। ये लकार कालवाचक हैं। इन लकारों के स्थान पर ही परस्मैपदी धातुओं के साथ तिप्, तस्, झि आदि अथवा आत्मनेपदी धातुओं के साथ त, आताम्, झ आदि प्रत्यय होते हैं।

क्रियों-पदों की रूपावलि

नीचे परस्मैपद में दिए गए गणों के सामने उल्लिखित धातुओं की रूपावलि केवल छह लकारों-

  • लट् (वर्तमानकाल), Lat (Present Tense)
  • लुट् (सामान्य भविष्यत्काल), Lut (Common Future Tense)
  • लुङ् (हतुहेतुमद् भविष्यत्काल),- Lud Lakar (Help Past Tense)
  • लङ् (अनद्यतन भूतकाल), Lad Lakar (Anadhatan Past Tense)
  • लोट् (आदेशवाचक) एवं, Lot Lakar (Commander)
  • विधिलिङ् (अनुज्ञा-विधिवाचक), Vidhilid Lakar (License) में दी जा रही है-

(क) भ्वादिगण- 1. भू 2. पठ् 3. गम् 4. स्था 5. पा 6. दृश् 7. दाण् 8. शुच् 9. अर्च् 10. तप
(ख) अदादिगण- 11. हन् 12. अस्
(ग) दिवादिगण- 13. नृत् 14. नश् 15. त्रस्
(घ) स्वादिगण- 16. चि 17. शक्
(ङ) तुदादिगण- 18. लिख् 19. इष 20. प्रच्छ् 21. सिच् 22. मिल 23. विद् 24. दिश् 25. तुद् 26. मुच्
(च) क्रयादिगण- 27. ग्रह् 28. ज्ञा
(छ) चुरादिगण- 29. गण एवं 30. पाल्

नीचे आत्मनेपद में दिए गए गणों के सामने उल्लिखित धातुओं की रूपावलि उपर्युक्त छह लकारों में ही दी जा रही है-
(क) भ्वादिगण-1. सेव् 2. लभ 3. वृत् 4. शुभ्
(ख) अदादिगण-5. शीङ्।
(ग) दिवादिगण-6. विद् 7. मन्

उभयपदी धातुओं के रूप में केवल 8 की रूपावलि दी जा रही है…
(क) भ्वादिगण-1. पच्।
(ख) अदादिगण-2. दुह् 3. ब्रू
(ग) जुहोत्यादिगण-4. दा
(घ) तनादिगण–5. तन् 6. कृ
(ङ) क्रयादिगण—7. क्री
(च) चुरादिगण-8. चुर् कुल 30+7+8-45 धातु

पुरुष

पुरुष- कोई बात जब किसी को कही जाती है तब उसके तीन पक्ष होते हैं-
(क) विषय-अन्य पुरुष (या प्रथम पुरुष)
(ख) श्रोतामध्यम पुरुष
(ग) वक्ता–उत्तम पुरुष

संस्कृत में क्रिया-पदों की रूपावलि में ‘पुरुष’ के बोध का यही क्रम स्वीकृत है।

वचन- संस्कृत भाषा में

वचन- संस्कृत भाषा में चाहे नाम-पद हों या आख्यात-पद, उनकी संख्या के बोध करानेवाले को ‘वचन’ (Number) कहते हैं। संस्कृत में ‘वचन’ तीन होते हैं…

  • एकवचन, द्विवचन और बहुवचन।

जैसे ‘सुप्’ प्रत्यय (जो कि संख्या में 21 हैं और नाम-पदों में जिनके जुड़ने से उनके कारक और वचन को बतानेवाली रूपावलि सामने आती है) विभक्तियों में बँटे होते हैं और प्रत्येक विभक्ति में तीन वचन होते हैं वैसे ही ‘तिङ्’ प्रत्यय भी ‘पुरुष’ में बँटे होते हैं और प्रत्येक ‘पुरुष’ में तीन वचन होते हैं।

जैसा कि ऊपर ही दिखाया गया है—पुरुष तीन होते हैं और प्रत्येक पुरुष की तीन विभक्तियाँ होती हैं, जो उनके एकवचन, द्विवचन और बहुवचन होने को बताती हैं। उदाहरण के लिए, नीचे ‘पठ्’ धातु की वर्तमानकाल (परस्मैपद) की रूपावलि दी जा रही है-

  • पठति – पठतः – पठन्ति
  • पठसि – पठथः – पठथ
  • पठामि – पठावः – पठामः

उपर्युक्त रूपावलि ‘पुरुष’ और ‘वचन’ दोनों को बता रही है।

वह निम्नलिखित प्रकार से है-

  • पुरुष – एकवचन – द्विवचन – बहुवचन
  • अन्य पुरुष- पठति – पठतः – पठन्ति
  • मध्यम पुरुष- पठथः – पठथ – पठ
  • उत्तम पुरुष- पठामि – पठावः – पठामः

इन क्रिया-पदों के अपने कर्ता-पदों के साथ प्रायोगिक रूप इस प्रकार होंगे-

  1. सः पुस्तकं पठति। – (वह पुस्तक पढ़ता है।)
  2. तौ पुस्तकं पठतः। – (वे दोनों पुस्तक पढ़ते हैं।)
  3. ते पुस्तकं पठन्ति। – (वे सब पुस्तक पढ़ते हैं।)
  4. त्वं पुस्तकं पठसि। – (तुम पुस्तक पढ़ते हो।)
  5. युवाम् पुस्तकं पठथः। – (तुम दोनों पुस्तक पढ़ते हो।)
  6. यूयम् पुस्तकं पठथ। – (तुम सब पुस्तक पढ़ते हो।)
  7. अहम् पुस्तकं पठामि। – (मैं पुस्तक पढ़ता हूँ।)
  8. आवाम् पुस्तकं पठावः। – (हम दोनों पुस्तक पढ़ते हैं।)
  9. वयम् पुस्तकं पठामः। – (हमलोग पुस्तक पढ़ते हैं।)
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