कर्म फल

ओ३म्

किमपि कर्म फलविहीनं न भवति।
= कोई भी कर्म फल बिना का नहीं होता है।

यद् किमपि वयं कुर्मः तस्य फलं तु मिलति एव।
= जो भी हम करते हैं उसका फल तो मिलता ही है।

कर्म विना कोsपि न जीवति।
= कर्म के बिना कोई नहीं जीता है।

कर्म विना कोsपि जीवितुं न शक्नोति।
= कर्म के बिना कोई जी नहीं सकता है।

अनुचितस्य कर्मणः फलम् अनुचितमेव भवति।
= अनुचित कर्म का फल अनुचित ही होता है।

उचितस्य कर्मणः फलम् उचितमेव भवति।
= उचित कर्म का फल उचित ही होता है।

उचितम् अनुचितं विचिन्त्य एव कर्म करणीयम् ।
= उचित अनुचित का विचार कर के ही कर्म करना चाहिये।

अस्माकं कर्मणा अन्ये अपि लाभं प्राप्नुवन्ति ।
= हमारे कर्म से अन्यों को भी लाभ होता है।

संस्कृतप्रचारकः अन्येषां लाभाय एव संस्कृतं पाठयति।
= संस्कृत प्रचारक दूसरों के लाभ के लिये ही संस्कृत पढ़ाता है।

योगप्रचारकः योगं कारयति जनाः लाभान्विताः भवन्ति।
= योगप्रचारक योग कराता है लोग लाभान्वित होते हैं।

चिकित्सकः चिकित्सां करोति , रुग्णः स्वस्थः भवति।
= चिकित्सक चिकित्सा करता है रोगी स्वस्थ होता है।

पुण्यकर्मणि ये रताः प्राप्स्यन्ति पुण्यं फलम् ।
= पुण्य कर्म में जो रत हैं वे पुण्य फल ही पाएँगे।

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